Saturday, October 14, 2023

वह हमारा पिता है

स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव।
सचस्वा नः स्वस्तये ॥यजु. ३।२४ ॥

हे (अग्ने) विज्ञानस्वरूपेश्वराग्ने! (सः) आप (नः) हमारे लिए (सूपायनः) सुख से प्राप्त, श्रेष्ठोपाय के प्रापक, अत्युत्तम स्थान के दाता तथा रक्षक कृपा से सदा हो। हे (स्वस्ति) स्वस्तिद परमात्मन्! सब दुःखों का नाश करके हमारे लिए सुख का वर्तमान सदैव कराओ, जिससे हमारा वर्तमान श्रेष्ठ ही हो।
(पिता इव) जैसे करुणामय पिता अपने (सूनवे) पुत्र को सुखी ही रखता है, वैसे आप हम को सदा (सचस्वा) सुखी रखो, क्योंकि जो हम लोग बुरे होंगे तो उसमें आपकी शोभा नहीं होना। किञ्च-सन्तानों के सुधारने से ही पिता की शोभा और बड़ाई होती है; अन्यथा नही॥
- आर्याभिविनय ग्रन्थ में महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा किए गए भाष्य के आधार पर
इस मन्त्र में परम पिता से प्रार्थना की गई है कि जैसे पिता अपने पुत्र के लिए सूपायन होता है वैसे ही हे प्रभु आप हमारे लिए सूपायन बनिए। जैसे पिता अपने पुत्र को सुखी रखने की कोशिश करता है वैसे ही हे पिता आप हमें सदा सुखी रखें। सूपायन के जो अर्थ महर्षि ने किए हैं उनसे परमात्मा को जानने का प्रयास करते हैं-
१. सुख से प्राप्त – परमेश्वर हमें सर्वदा सुख से प्राप्त है। मनुष्य के दुःखों और तनाव का एक बड़ा कारण है परमेश्वर को अपने से दूर मानना। हम जब कभी दुःख में होते हैं, पीड़ा में होते हैं, मुसीबत में होते हैं – यही पुकारते हैं – हे प्रभु तुम कहां हो, देखो तो मैं कितनी पीड़ा में हूं। हम उसे ढूंढने निकलते हैं। हम मन्दिरों में, गिरजाघरों में, गुरूद्वारों में, मस्जिदों में... दुनिया के तमाम धर्मस्थलों में उसे खोजने लगते हैं। बड़े बड़े पर्वतों पर चढ़ते हैं, नदियों के किनारे भटकते हैं, तीर्थस्थानों में घूमते हैं...बस खोज में लगे रहते हैं। और जब कोई विद्वान कोई ब्रम्हज्ञानी मिल जाता है, कोई गुरू मिल जाता है तो वह क्या बताता है--- बैठ जाओ, अपने अन्दर खोजो, अपने अन्दर झांको। अरे सारी दुनिया घूम कर आपके पास आया और आप कहते हैं वो मेरे ही अन्दर है।
जब उसे ढूंढने निकले तो निशां तक ना मिला
दिल में मौज़ूद रहा आंख से ओझल निकला
दौड़ दौड़ के थक गया अब पता चला कि वो तो मुझे हमेशा प्राप्त है। एक जगह महर्षि कहते हैं – ईश्वर हमें सर्वदा सुख से प्राप्त है पर मलिन अन्तःकरण के कारण उसकी प्रतीती नहीं होती। मन्त्र कहता है जैसे पुत्र को पिता सदा सुख से प्राप्त है वैसे ही प्रभु हमें सदा सुख से प्राप्त है, दुःख से नहीं, कष्ट से नहीं। कष्ट है, दुःख है, पीड़ा है, मुसीबत में फंसे हो... चिन्ता की क्या बात है... दुनिया का मालिक तुम्हारा पिता है बस जरा उससे अपनी बात कह कर तो देखो.. कहीं खोजने नहीं जाना है। वह यहीं है तुम्हारे पास तुम्हारे साथ।
२. श्रेष्ठोपाय का प्रापक – जब हम यह कहते हैं कि मुसीबत में प्रभु की शरण में जाओ तो उससे हमारा तात्पर्य है कि प्रभु से ही उपाय पूछा जाए। मन्त्र कहता है कि वह परमात्मा श्रेष्ठ उपाय को बताने वाला है। मनुष्य अल्पज्ञ है अर्थात सीमित ज्ञान वाला है। जब हम किसी मनुष्य से उपाय पूछते हैं तो वह सीमित ज्ञान से सीमित अनुभव से उपाय बताता है। वह उपाय श्रेष्ठ होगा या नहीं पता नहीं। पर परमात्मा पूर्ण ज्ञानी है... उसका ज्ञान सीमित नहीं है... जब वह उपाय बताता है तो वह श्रेष्ठ उपाय बताता है। यहां सर्वश्रेष्ठ शब्द का उपयाग नहीं किया गया है.. सर्वश्रेष्ठ का अर्थ है – सब उपायों में श्रेष्ठ – पर प्रभु बहुत से उपाय नहीं बताता – उसकी सोच उसका ज्ञान काल, क्षेत्र, ज्ञान की सीमा में नहीं बंधी है... अतः प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि, ज्ञान और परिस्थिति के आधार पर वह एक ही उपाय जो श्रेष्ठ है बताता है। पर प्रश्न उठता है कि क्या प्रभु उपाय बताता है? मेरा उत्तर है हां। यह उत्तर व्यक्तिगत अनुभव पर ही आधारित है। आप भी सोचें कभी ऐसा हुआ है कि आप मुसीबत में थे – कोई उपाय कोई रास्ता नहीं दिख रहा था - आप गहन चिन्तन में चले गए और अचानक अन्दर से एक उपाय सूझा और लो मुसीबत से छुटकारा मिलने का रास्ता खुल गया। यह आवश्यक नहीं है कि उस समय हम प्रभु को भी याद कर रहे थे या नहीं .. क्योंकि मन्त्र कह रहा है कि वह पिता की तरह पुत्र के लिए श्रेष्ठोपाय का प्रापक है। जैसे यह आवश्यक नहीं है कि पुत्र को हर बार पिता को पुकारना ही पड़े.. कभी कभी पुत्र की गहन चिन्तन की स्थिति भी पिता (माता) को स्वमेव उसकी सहायता के लिए प्रेरित कर देती है। पर आवश्यक है कि पुत्र ने पिता का स्नेह जीत रखा हो और यह भी आवश्यक है कि पुत्र पिता के बताए गए उपाय पर विश्वास करे।
इसका एक और उदाहरण है विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए सिद्धान्त। उदाहरण के लिए जब न्यूटन वस्तुओं के नीचे गिरने के कारण पर विचार कर रहा था तब उसे कैसे पता चला कि यह गुरूत्वाकर्षण है। निश्चित रूप से उसने इस समस्या पर गहन चिन्तन किया होगा। चिन्तन करते हुए उसे यह दिशा मिली होगी और वह समस्या के समाधान तक पहुंच गया। यदि हम कहते हैं कि इसमें प्रभु का कुछ लेना देना नहीं है – उसने तो अपनी बुद्धि का प्रयोग किया और उस सिद्धांत तक पहुंच गया। बुद्धि जड़ वस्तु है, स्वयं निर्णय नहीं ले सकती, तो इसका अर्थ है कि या उसकी बुद्धि में यह सिद्धान्त पहले से था या कहीं बाहर से यह सिद्धान्त बुद्धि में आ गया। दोनों ही स्थितियों में सिद्धान्त की नई खोज नहीं हुई वल्कि पहले से खोजे गए या जाने गए सिद्धान्त को हमारे सामने रखा गया। पहले से बुद्धि में होना सम्भव नहीं क्योंकि यदि था तो खोजने की आवश्यकता ही नहीं थी। यदि बाहर से आया, तो जहां से आया वह कोई ऐसी वस्तु है जिसके ज्ञान में यह सिद्धान्त पहले से था। यदि वह कोई मनुष्य था तो पुनः इसी प्रक्रिया से उसे भी यह ज्ञान कहीं बाहर से मिला। इस तरह से हम इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि सबसे पहले जिस किसी को भी इस सिद्धान्त का ज्ञान हुआ वह ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं हो सकता।
ऊपर की सारी चर्चा केवल इसलिए है कि हम यह समझ सकें कि जब कभी हम मुसीबत में होते हैं तो वही प्रभु हमें श्रेष्ठ उपाय बताता है। बस हमें उस पर विश्वास करके अपने मन को सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त करके उससे श्रेष्ठ उपाय बताने की प्रार्थना करनी है।
अत्युत्तम स्थान के दाता – जब हम उससे प्रार्थना करते हैं उससे श्रेष्ठ उपाय बताने का अनुरोध करते हैं तो वह अवश्य बताता है। उस उपाय पर चलने से हम उन उत्तम उत्तम स्थानों को पा लेंगे जिन्हें हम पाना चाहते हैं या जो हमें मिलने चाहिए। देखा जाए तो यह बात स्पष्ट ही है कि यदि हमें श्रेष्ठ उपाय बताए जाएं और हम उन पर अमल करें तो निश्चित रूप से हम सफलता पाएंगे ही। संसार में जितने भी महान पुरूष हैं वे सभी उसी सिद्धान्त से उन उत्तम स्थानों को पा सके हैं।
रक्षक – वह हमारा रक्षक भी है। जैसे पिता अपनी सन्तान की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहता है वैसे ही प्रभु भी हमारी रक्षा के लिए तत्पर है। उपरोक्त तीनों गुण भी इस बात को और पक्का करते हैं। जो हमेशा हमारे साथ है, जो हमे मुसीबत से निकलने के उत्तम उपाय बताता है, और हमें उत्तम स्थानों को प्राप्त कराता है – वह हमारा रक्षक ही तो है। रक्षक वह नहीं है जो शस्त्र लेकर हमारे आगे खड़ा हो जाता है, क्योंकि उसके मरते ही हम पुनः मुसीबत में फंस जाएंगे। रक्षक वह है जो हमें तैयार करता है। जो हमें मुसीबत से बचने के उपाय बताता है, और उपाय बताने के लिए सदा हमारे पास है। जो सारी दुनिया का मालिक है उसके होते हुए हमें दुनिया से भय क्यों हो।
कृपा से सदा – परमात्मा उपरोक्त गुणों को हमारे अनुरोध हमारे हठ के कारण धारण नहीं करता वल्कि वह तो अपनी कृपा से ही सदा से इन गुणों को धारण करता है। हमारी सहायता हमारी रक्षा के लिए परमात्मा को हमारे अनुरोध की अपेक्षा नहीं है। यह उसकी कृपा है कि वह यह सब करता है।
इसीलिए हम उससे सुख चाहते हैं और इन्हीं तरीकों से वह हमें सुख प्राप्त कराता है। दुःख से बचाव दुःख के कारणों की निवृति से होगा और सुख की प्राप्ति सुख के उपाय करने से होगी – यह योगदर्शनकार का मत है। दुःख का कारण परमात्मा के उपायों को न मानना और सुख का उपाय उन उपायों को मानना है। आइए इस वेद मन्त्र के बताए मार्ग से हम दुःखों से छूट कर सुखों को प्राप्त करें।
आइए एक और दृष्टि से देखें - यदि हम ध्यान से देखें तो परमात्मा ने इसी मन्त्र में हमें यह भी बता दिया है कि माता पिता में क्या गुण होने चाहिए।
१. सबसे पहला माता पिता को सन्तानों के लिए सुख से प्राप्त होना चाहिए। वो सन्तानें निश्चित ही दुःखी रहती हैं जिनके माता पिता उन्हें नहीं मिलते या बहुत कम समय दे पाते हैं। यदि आप माता या पिता हैं और अपनी सन्तान को सुखी देखना चाहते हैं तो आज ही निर्णय लीजिए कि आप जितना अधिक हो सकेगा अपनी सन्तान को समय देंगे। आपके जीवन की सभी उपलब्धियां बेकार हैं यदि उनको आपने अपने बच्चों का समय चुरा कर दिया है। जीवन की कोई भी उपलब्धी आपकी सन्तान के सुख से बड़ी नहीं है।
२. दूसरी बात, जब आपके बच्चे आपसे सहायता मांगने आएं तो आपके ज्ञान में जो सबसे श्रेष्ठ उपाय है उन्हें बताएं। सभी पूर्वाग्रहों को भूलकर सबसे उत्तम उपाय बताएं। यदि सहायता मांगने नहीं भी आते हैं तो भी देखें कहीं वे किसी मुसीबत में तो नहीं। अपने बच्चों पर लगातार नजडर रखें और जब आवश्यक लगे उन्हें उपाय बताते रहें।
३. तीसरी बात, हमेशा इस कोशिश में रहें कि अपने बच्चों को उत्तम स्थान प्राप्त कराएं। जो सहायता, जो शिक्षा, जो उपाय उन्हें उत्तम स्थान प्राप्त करने के लिए आप बता सकते हैं बताएं। यदि आप के ज्ञान में नहीं है तो खोजें औरों से सहायता लें, और हमेशा ढूंढते रहें कि क्या करने से आपका बच्चा उत्तम स्थान प्राप्त कर सकता है।
४. अपने बच्चों के रक्षक बनें। आपके बच्चे आपकी सबसे अनमोल सम्पति है। उनकी रक्षा जी जान से करें। उनकी रक्षा अपने धन से भी अधिक करें।
अन्तिम बात यह सब आप अपनी ओर से करें। बच्चों से अपेक्षा किए बिना करें। जैसे प्रभु अपनी कृपा से हमारा रक्षक है वैसे ही आप भी बच्चों पर बिना किसी अपेक्षा के कृपा करें।

Friday, December 28, 2018

*BHAGWAD GiTA* in one sentence per chapter.

🕉


              *BHAGWAD GiTA*
                _*in one sentence*_
                   _*per chapter...*_


*Chapter 1*

_Wrong thinking is the only problem in life_

*Chapter 2*

_Right knowledge is the ultimate solution to all our problems_

*Chapter 3*

_Selflessness is the only way to progress & prosperity_

*Chapter 4*

_Every act can be an act of prayer_

*Chapter 5*

_Renounce the ego of individuality & rejoice in the bliss of infinity_

*Chapter 6*

_Connect to the Higher consciousness daily_

*Chapter 7*

_Live what you learn_

*Chapter 8*

_Never give up on yourself_

*Chapter 9*

 _Value your blessings_

*Chapter 10*

_See divinity all around_

*Chapter 11*

_Have enough surrender to see the Truth as it is_

*Chapter 12*

_Absorb your mind in the Higher_

*Chapter 13*

_Detach from Maya & attach to Divine_

*Chapter 14*

_Live a lifestyle that matches your vision_

*Chapter 15*

_Give priority to Divinity_

*Chapter 16*

_Being good is a reward in itself_

*Chapter 17*

_Choosing the right over the pleasant is a sign of power_

*Chapter 18*

_Let Go, Lets move to union with God_

Tuesday, February 28, 2017

30 Insights for a Life of Acute Brilliance By Robin Sharma

30 Insights for a Life of Acute Brilliance

By Robin Sharma

#1. The great call on our lives is to do our part to make other lives better.
#2. Get enough rest. It’s a key factor in high performance + longevity.
#3. Focus on how far you’ve come versus how far you still have to go.
#4. Make the time to thank those who have encouraged you along the way.
#5. Remind yourself relentlessly that mastery comes from going to your edges rather than clinging to what’s known.
#6. Do more things that make you happy.
#7. Practice removing complaint from your vocabulary (bonus tip: complaint is often frozen anger).
#8. See your work as your craft. And devote yourself to knowing more about what you do than anyone who has ever done what you do.
#9. Remember that creativity + peak productivity are seasonal: there’s a time to plant and a time to harvest.
#10. Be kind to strangers. You just might save a life this way.
#11. Regularly rewrite how you will have wished you will have lived on the last day of your life in your journal. This heightens your focus on doing what counts. And trains your brain to get it done.
#12. Read for an hour a day. This ritual opens up frontiers that will make you a better producer, a deeper thinker and a richer human.
#13. Walk into the situations that terrify you. This is how bravery grows. And the finest way I know of to take your power back.
#14. Know that internal power, cultivated via years of inner work (reading + visualizing + contemplating + affirming + journaling + discussing + meditating + going to conferences etc.) is exponentially more valuable (and fulfilling) than external power (titles/status/cash)…a strong character always beats a large bank account…and decency lasts longer than fame.
#15. When you stumble, just say “I am sorry”.
#16. When you hurt, just feel the hurt.
#17. When you love, just trust in it fully.
#18. When you dream, know it’s the wisest part of you suggesting the next level available to you. Take the hint.
#19. Remind yourself that health is wealth. And should you lose yours, nothing will be more important than getting it back.
#20. Protect your mindset. Negative stimuli have never been so everywhere. So please: Less news and more beauty. Less gossip and more art. Less grumbling and more gratitude.
#21. Learn from the past but don’t wallow in it.
#22. Remember that your income will never exceed your self-identity. And that your outer results mirror your inner story.
#23. When you fall, get back up. When you win, decide how you’ll make it even better.
#24. Work hard on being more present. Presence is rare these days–and a phenomenal gift to give those who intersect your days.
#25. Laugh at yourself. Life’s too short to take yourself too seriously.
#26. Trust that blaming others is excusing yourself.
#27. Know that success lies around a brilliant execution on the fundamentals.
#28. Having a grand vision is cool. Being amazing at getting it done is far hipper.
#29. Be good at living your own life + values versus great at living everyone else’s.

#30. Don’t miss the so-called ordinary pleasures every day brings to the wise soul who notices them…the singing birds or the beautiful coffee or the inspirational poem or the laughing child or the clean water or breezes winding through the lush trees…witnessing these forges a life gorgeously lived…