आईए कुछ बात करें
जलते मौसम की, बरसते बादल की
ठिठुरती सर्दी की, सरकते दलदल की
हवा की, ठण्डक की, घटा के काजल की
फूलों का खुश्बू की, सबा के आंचल की
आईए कुछ बात करें
दूर अंधेरों की फैलती रोशनी की
गमों के जमघट की खेलती खुशी की
सियासी चालों की लुभाती कुर्सी की
बिरोधी भाषणों की सरकारी चुप्पी की
आईए कुछ बात करें
चोरी के गानों की, फिल्मी नंगेपन की
दरकते रिश्तों की, टूटते आंगन की
तड़पती जवानी की, बिलखते बचपन की
मुट्ठी भर खुशी को तरसते जनगन की
आईए कुछ बात करें
बीते आज़ादी के इतने सालों की
हमने जो झेले उन सब तूफानों की
चिकने से खुरदरे होते हुए गालों की
बापू की आंखो में उभरते सवालों की
आईए कुछ बात करें
आईए कि हम कर सकते हैं बस यही
बतियाएं और सो जाएं चैन से सभी
जुल्मों को देखें सहें न करें कुछ भी
आज़ादी है हमें बस बातें ही करने की
आईए कुछ बात करें
Thursday, February 18, 2010
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