पीत के रोगी सब कुछ बूझे, सब कुछ जाने होते हैं
इन लोगों के ईंट न मारो, कहां दिवाने होते हैं
आहें इनकी उमड़ते बादल, आंसू इनके अब्र-ए-मतीर
दश्त में इनको बाग़ लगाने, शहर बसाने होते हैं
हम न कहेंगे आप हैं पीत के दुश्मन मन के कठोर मगर
आ मिलने के, ना मिलने के लाख बहाने होते हैं
अपने से पहले दश्त में रहते, कोह से नहरें लाते थे
हम ने भी इश्क किया है लोगो सब अफ़साने होते हैं
इंशाजी, छब्बीस बरस के होके ये बातें करते हो
इंशाजी, इस उम्र के लोग तो बड़े सयाने होते हैं
----इब्ने इंशा
Friday, November 4, 2011
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