Thursday, August 7, 2014

वेद में यज्ञोपवीत

3म्‌ स सूर्यस्य रश्मिभिः परिव्यत तन्तुं तन्वानस्त्रिवृतं यथा विदे।
नयन्नृतस्य प्रशिषो नवीयसीः पतिर्जनीनामुपयाति निष्कृतम्‌।। (ऋग्वेद 9.86.32)
शब्दार्थ- (सूर्यस्य रश्मिभिः) ज्ञान-रश्मियों से (परिव्यत) आवृतपरिवेष्टित आत्मावाला (सः) वह गुरु (त्रिवृतं तन्तुं) तीन बटवाले धागेयज्ञोपवीत को (तन्वानः) धारण कराता हुआ (यथा विदे) सम्यक्‌ ज्ञान के लिए (ऋतस्य) सृष्टि-नियम की (नवीयसीः) नवीनअति उत्तमोत्तम (प्रशिषः) व्यवस्थाओं का (नयन्‌) ज्ञान कराता हुआ (पतिः) उनका पालक होकर (जनीनाम्‌) सन्तानोत्पादक माताओं के (निष्कृतम्‌ उपयाति) सर्वश्रेष्ठ पद को प्राप्त करता है।