Thursday, April 22, 2010

एक आवश्यक क्रिया

एक आवश्यक क्रिया सा हो गया है
हर रात गुस्से में आग बबूला होना

क्योंकि हमारे आस पास जो हो रहा है
अंग बन गया है दिनचर्या का

कानों ने चौंकना बंद कर दिया है
आंखों ने छोड़ दिया है फैलना सिकुड़ना
वातावरण में भर गई सड़ांध की
आदी हो गई है नाक भी
करोड़ों रुपए अब आम बात लगते हैं
घोटाला यूं जैसे परिचित का नाम हो

हर रात समाचार सुनकर
नपुंसक गुस्से को चीख चिल्लाकर निकाल
विस्तर में घुस जाते हैं
सुबह दफ़्तर भी तो जाना है

2 comments:

aarkay said...

बापू के तीन बंदरों की भांति , देखे को अनदेखा , सुने को अनसुना करना और जुबां पर ताला लगा कर रखने का समय चल रहा है . साथ ही काली दाल में सफ़ेद ढूँढने की कोशिश भी चली रहती है.
सटीक विचार व सुंदर कविता !

Sachin said...
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