Wednesday, September 30, 2026

क्लेश कैसे घटें, समाधि कैसे सधे? क्रियायोग से करें शुरुआत

क्लेश कैसे घटें, समाधि कैसे सधे? क्रियायोग से करें शुरुआत


*पतञ्जलि योगदर्शन के साधनपाद के सूत्र २.१ और २.२ पर आधारित*


सभी को सादर नमस्ते जी।


योग के पथ को चुनते हुए स्वभाविक प्रश्न उठता है—हम शुरुआत कहाँ से करें? साधना के मार्ग पर पहला कदम कैसे रखें?


हम साधना करना चाहते हैं। कभी मन एकाग्र भी होता है, लेकिन कुछ देर बाद फिर भटकने लगता है। ऐसे साधक के लिए महर्षि पतञ्जलि ने साधनपाद के आरम्भ में एक सहज मार्ग बताया है—**क्रियायोग।**


## मन कुछ देर टिकता है, फिर भटक जाता है


योग की चर्चा में ‘विक्षिप्त चित्त’ शब्द आता है। यहाँ विक्षिप्त का अर्थ पागल नहीं है। यह चित्त की उस स्थिति को समझने का शब्द है, जिसमें कभी एकाग्रता आती है, लेकिन वह स्थायी नहीं रहती। कुछ देर बाद चंचलता फिर लौट आती है।


हममें से अनेक लोग अपने भीतर ऐसी स्थिति अनुभव करते हैं। धर्म, स्वाध्याय और साधना की इच्छा तो होती है, लेकिन मन अधिक देर तक वहाँ टिक नहीं पाता। प्रश्न यही है कि इस चित्त को साधना के लिए कैसे तैयार किया जाए।


## क्रियायोग के तीन अंग


महर्षि पतञ्जलि कहते हैं—


> **तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥२.१॥**


अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—ये क्रियायोग हैं। आइए, इन्हें अपने दैनिक जीवन के उदाहरणों से समझें।


## १. तप: बाधाओं के बीच अपने ध्येय पर टिके रहना


तप को यहाँ इस प्रकार समझ सकते हैं—अपने ध्येय की साधना करते हुए सामने आने वाले द्वन्द्वों को सहन करना। सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी और भूख-प्यास जैसे द्वन्द्व हमें विचलित कर सकते हैं।


मान लीजिए, आपने सुबह साधना का समय निश्चित किया है। एक दिन ठंड अधिक हुई और मन ने विकल्प दे दिया—“दो दिन से तो साधना कर ही रहे हैं। आज छोड़ देते हैं, कल फिर कर लेंगे।”


ऐसे में ठंड का उचित उपाय करके अपने अभ्यास में लगे रहना तप का व्यावहारिक रूप है। गर्मी अधिक हो तो पंखा चलाकर साधना कीजिए। साधना में बाधा का समाधान कीजिए; हर असुविधा को साधना छोड़ने का बहाना मत बनाइए।


**तप का उद्देश्य अपने शरीर को अनावश्यक पीड़ा देना नहीं है।** केवल कष्ट प्रदर्शन को साधना मान लेना उचित नहीं। व्यासभाष्य में भी तप का सेवन इस प्रकार करने का संकेत है कि चित्त की प्रसन्नता बाधित न हो।


इसलिए तप का आशय समझदारी के साथ अनुशासन निभाना है। अपने लिए साधना का ऐसा नियम बनाइए जिसे आप निभा सकें, और फिर परिस्थितियों के बीच उसे बनाए रखने का प्रयास कीजिए।


## २. स्वाध्याय: अर्थ सहित जप और मोक्षमार्ग का अध्ययन


स्वाध्याय में प्रणव अर्थात् ओ३म् तथा पवित्र मन्त्रों का जप और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले शास्त्रों का अध्ययन आता है।


जप करते समय एक बात विशेष ध्यान में रखनी चाहिए—शब्द के साथ उसके अर्थ की भावना भी बनी रहे। समाधिपाद का सूत्र है—


> **तज्जपस्तदर्थभावनम्॥१.२८॥**


अर्थात् उसका जप और उसके अर्थ की भावना।


जब हम ओ३म् का जप करें, तो ईश्वर के स्वरूप का भी चिन्तन करें—वह रक्षक, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी और दयालु है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज के दूसरे नियम में ईश्वर के जिन गुणों का वर्णन किया है, उनका स्मरण भी इस चिन्तन में सहायक हो सकता है।


इसी प्रकार गायत्री मन्त्र का जप करते हुए उसके अर्थ की भावना मन में बनाए रखें। जप केवल शब्दों की पुनरावृत्ति तक सीमित न रहे; मन भी उनके भाव से जुड़े।


स्वाध्याय का दूसरा पक्ष है शास्त्रों का अध्ययन। योगदर्शन, उपनिषद् तथा मुक्ति का मार्ग समझाने वाले अन्य ग्रन्थ पढ़ें। अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार वेदमन्त्रों के अर्थ का अध्ययन भी करें। ऐसे अध्ययन से साधना की दिशा स्पष्ट होती है और मुक्ति के प्रति आकांक्षा पुष्ट होती है।


अपने दैनिक क्रम में अर्थ सहित जप और विचारपूर्वक अध्ययन—दोनों के लिए कुछ समय रखिए।


## ३. ईश्वर-प्रणिधान: कर्म और उसके फल का समर्पण


ईश्वर-प्रणिधान का अर्थ है अपने कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करना और उनमें अहंकार की भावना को कम करना।


“मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ” की भावना के स्थान पर यह भाव विकसित हो—“मैं अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करता हूँ और अपने कर्म तथा उसके फल को ईश्वर के प्रति समर्पित करता हूँ।”


इसे समझने में गीता की निष्काम कर्म की भावना सहायक है। कर्म करते हुए फल के प्रति आसक्ति को कम करना और अपने जीवन में समर्पण का भाव लाना साधना का महत्त्वपूर्ण पक्ष है।


इस भाव को केवल साधना के समय तक सीमित न रखें। जीवन के अच्छे कार्यों और दैनिक कर्तव्यों में भी इसे स्थान दें।


## क्रियायोग का प्रयोजन क्या है?


अगले सूत्र में महर्षि पतञ्जलि बताते हैं—


> **समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च॥२.२॥**


अर्थात् क्रियायोग का प्रयोजन समाधि की भावना अथवा उसके अभ्यास को विकसित करना और क्लेशों को क्षीण करना है।


तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान से साधना के लिए चित्त तैयार होता है। अभ्यास के प्रति निष्ठा बढ़ती है और भीतर की उन बाधाओं को कम करने की दिशा मिलती है जो हमें बार-बार विचलित करती हैं।


क्लेशों की विस्तार से चर्चा हम आगे करेंगे। यहाँ इतना समझना पर्याप्त है कि योगदर्शन में क्लेशों का सम्बन्ध हमारे दुःख और बन्धन के मूल कारणों से है। काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकारों को समझने के लिए भी इन मूल कारणों पर विचार आवश्यक है। क्रियायोग का लक्ष्य क्लेशों को धीरे-धीरे तनु अर्थात् दुर्बल करना है।


## शुरुआत छोटी हो, लेकिन नियमित हो


यदि आप योगमार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं, तो क्रियायोग को अपने जीवन में स्थान दीजिए।


- **तप:** साधना का नियमित समय रखें और सामान्य बाधाओं का उचित समाधान करते हुए अभ्यास में टिके रहें।

- **स्वाध्याय:** ओ३म् तथा मन्त्रों का अर्थ सहित जप करें और साधना में सहायक शास्त्रों का अध्ययन करें।

- **ईश्वर-प्रणिधान:** अपने कर्मों में अहंकार और फलासक्ति को कम करते हुए समर्पण का भाव रखें।


इन अभ्यासों से धीरे-धीरे साधना के प्रति आपकी निष्ठा दृढ़ हो सकती है। मन को एकाग्रता की दिशा मिलती है और योग तथा समाधि के लिए आगे प्रयास करने की तैयारी बनती है।


**सीखते रहें, साधना करते रहें।**


— अखिलेश भारती


[इस विषय पर मेरा वीडियो देखें](https://www.youtube.com/watch?v=wlbteQi-aFA)


No comments: