Wednesday, March 31, 2010

ग़ज़ल - 2

फ़क़त हम ही को न सज़ाएं मिलीं
ग़म की और भी कथाएं मिलीं

गले लग जी भर के रोया
तेरे वतन की जो हवाएं मिलीं

जो भी चाहा वो कहां मिला
मौत मांगी थी दुआएं मिलीं

तुझे भूलना कहां आसान था
हर गाम तेरी सदाएं मिलीं

‘अश्क’ ने बरसना ही हुआ
क्या ताज्जुब कि घटाएं मिलीं

Saturday, March 27, 2010

ग़ज़ल - 1

चलो फिर ग़ज़ल कहें उदासी दूर करें
पूरी तरह न ही सही ज़रा सी दूर करें

आओ फिर हाथ जोड़ें आंखें बन्द करें
दिल में उठती शैतानी बला सी दूर करें

कब तक उम्मीद रखें कोई मसीहा आएगा
आओ ख़ुद ही मुस्कराएं खला सी दूर करें

राहें सुनसान इंतज़ार करें कब तलक
ताज़े मोड़ दे के सिलसिला बासी दूर करें

क्यों न दिल ही के आईने में तलाशें उसे
दैर-ओ-हरम भूल जाएं काबा कासी दूर करें

खिड़कियां दिमाग की खोल दें अपनी ‘अश्क’
सड़े फ़िक्रों की उमस भरी हवा सी दूर करें

Friday, March 26, 2010

तुम्हारी प्रशंसा के गीत

कई बार सोचा रुकूं
तुम्हारी प्रशंसा में गीत कहूं
फिर चलूं

कहूं वह सब कुछ जो तुम्हें खुश कर दे
पर रोका है स्वयं को
अगर सब कह दिया –
तो मेरे पास मेरे मन में क्या रह जाएगा

तो प्रिय रहने दो
मुझे संजो कर रखने दो
तुम्हारी हर ज़ुल्फ़ के गीत को
होंठों की ग़ज़ल को
ता जो तन्हाई में
मेरे पास कुछ तो हथियार हो...

Monday, March 22, 2010

तारे तोड़ लाने के सपने

तारे तोड़ लाने के सपने/
मेरी आंखों तक भी पहुंचे
पर पैरों के नीचे ज़मीन ही नहीं थी
ख़ुद को ज़मीन खोजने में लगा दिया
ताकि ज़मीन पर पाँव रखूं
उछलूं
और भर लूं तारों से झोली
पर काफ़ी खोजने के बाद भी
ज़मीन नहीं मिली
अब मेरी आंखों में ज़मीन ही का सपना है –
तारों को मैं भूल चुका हूं

Saturday, March 20, 2010

एक किताब की मानिन्द

एक किताब की मानिन्द
खोल दिया ज़िन्दगी को हर किसी के सामने
ता जो दोस्त न सही
ग़ल़तफ़हमी में कोई मिलने वाला दुश्मन न बन जाए
पर हर आदमी सलीके से नहीं पढ़ता किताब
कुछ उसके वरक मोड़ कर निशान लगाने की साजिश करते हैं
कुछ उसकी अहमियत न समझ –
उसे इस्तेमाल करते हैं चाय या पानी का गिलास रखने के लिए
वाज़ इन्सान –
खुली किताब की फ़िक्र न कर - करने लगते हैं कुछ और काम
ऐसे में उसके खू़बसूरत या बदसूरत पर अहम वरकों पर
स्याही या कुछ और गिर जाए
उसे दाग़ी कर दे
इतना कि हर्फ़ दिखने बंद हो जाएं
उन्हें इससे कुछ लेना देना नहीं है
मैं सोचता हूं
बल्कि यकीनन यह चाहता हूं
कि किताब बन्द कर दूं
कि फिर कभी न खोलूं
पर यारब़ !
जिनके सामने खुल चुकी है बन्द करने भी देंगे।

Monday, March 8, 2010

युद्ध का सत्य

मैं मानता हूं मित्र
कि जिस ओर खड़े हो तुम
वहीं है सत्य
वहीं है धर्म
वहीं है जगदीश्वर भी
मगर जब तक महाभारत की घोषणा न हो जाए
कृष्ण का कर्त्वय होता है युद्ध टालना

तीर तलवार विध्वंस की भाषा जानते हैं
गोली का सत्य केवल मृत्यु देना है
और युद्ध का परिणाम नहीं होता जय या पराजय
होता है परिणाम
अवशेष
टूटे हुए मकान
डरे हुए मन
सिमटे हुए मनुष्य
अभिमन्यु हो – द्रोण हो – या हो भीष्म
सबको होना होता है अन्याय का शिकार
धृतराष्ट्र को भी कोसना पड़ता है अपने अन्धेपन को
युधिष्ठर को भी भोगना पड़ता है नरक
जब कभी भी किया जाता है सत्य के लिए युद्ध
सत्य भी हो जाता है दफ़न शवों के ढेर के नीचे
फिर कोई नहीं बचता जो कह सके कि
सत्य की हुई है विजय

कोई भी महाभारत निर्णय नहीं कर पाता सत्य का
मगर जब कभी भी होता है सत्य की द्रौपदी का अनादर
महाभारत निश्चित हो ही जाता है
द्रौपदी का शील स्वयं प्रमाण है सत्य का
उसका दांव पर लगना ही उसका अनादर है

इसीलिए कहता हूं मित्र सत्य को दांव पर मत लगाओ
सत्य का अनादर जन्म देगा महाभारत को
और महाभारत होना सत्य की मृत्यु है

Tuesday, March 2, 2010

नपुंसक पीढ़ी

काफी हाऊसों में
काफी में घुलते मिलते नाराज़गी के शब्द
थोड़ी गर्म बहसें
ऊपर उठा कर हाथ ज़ोरदार आवाज़ में विरोध प्रकटन
और फिर आंखों में उतर आए गुस्से को
दो चार भद्दी गालियों के साथ थूक देना पूरी व्यवस्था के माथे पर
फिर
काफी पी कर सड़क तक आते आते
वो गालियां
वो विरोध
वो बहसें
वो नाराज़गी
जाने कहां खो जातीं हैं
और यहीं समाप्त हो जाता है
मेरी पीढ़ी की युवाशक्ति का विद्रोह