चलो फिर ग़ज़ल कहें उदासी दूर करें
पूरी तरह न ही सही ज़रा सी दूर करें
आओ फिर हाथ जोड़ें आंखें बन्द करें
दिल में उठती शैतानी बला सी दूर करें
कब तक उम्मीद रखें कोई मसीहा आएगा
आओ ख़ुद ही मुस्कराएं खला सी दूर करें
राहें सुनसान इंतज़ार करें कब तलक
ताज़े मोड़ दे के सिलसिला बासी दूर करें
क्यों न दिल ही के आईने में तलाशें उसे
दैर-ओ-हरम भूल जाएं काबा कासी दूर करें
खिड़कियां दिमाग की खोल दें अपनी ‘अश्क’
सड़े फ़िक्रों की उमस भरी हवा सी दूर करें
Saturday, March 27, 2010
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1 comment:
आपकी ग़ज़ल का एक एक हर्फ मानीखेज़
है ! बहुत खूब कहा है आपने !
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