एक किताब की मानिन्द
खोल दिया ज़िन्दगी को हर किसी के सामने
ता जो दोस्त न सही
ग़ल़तफ़हमी में कोई मिलने वाला दुश्मन न बन जाए
पर हर आदमी सलीके से नहीं पढ़ता किताब
कुछ उसके वरक मोड़ कर निशान लगाने की साजिश करते हैं
कुछ उसकी अहमियत न समझ –
उसे इस्तेमाल करते हैं चाय या पानी का गिलास रखने के लिए
वाज़ इन्सान –
खुली किताब की फ़िक्र न कर - करने लगते हैं कुछ और काम
ऐसे में उसके खू़बसूरत या बदसूरत पर अहम वरकों पर
स्याही या कुछ और गिर जाए
उसे दाग़ी कर दे
इतना कि हर्फ़ दिखने बंद हो जाएं
उन्हें इससे कुछ लेना देना नहीं है
मैं सोचता हूं
बल्कि यकीनन यह चाहता हूं
कि किताब बन्द कर दूं
कि फिर कभी न खोलूं
पर यारब़ !
जिनके सामने खुल चुकी है बन्द करने भी देंगे।
Saturday, March 20, 2010
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3 comments:
भारती जी , ऐसा हम सभी के साथ होता है , पात्र -कुपात्र का विचार किये बिना हम कई बार मन का चिठ्ठा लोगों के सामने खोल देते हैं तो यह स्थिति तो आएगी ही. समझदारी से काम लेना ही उचित है .
पुनश्च : बहुत सुंदर कविता लिखी है आपने .
हा हा हा ... पर क्या करें विश्वास भी कर ही लेते हैं
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