आसमां पर बिठाते हैं सुना कर तालियां
लोग चाल चलते हैं बजा कर तालियां
हम ख़ुद ही से न कर पाए तारीफ़ अपनी
वो मशहूर हो गए छपवा कर तालियां
जिन हाथों को पकड़ दिखाया था रास्ता
मज़ाक़ उड़ाते हैं वो ही बजा कर तालियां
क्यों तक़लीफ़ देते हैं लोग हाथों को
हुज़ूर तो भूल जाते हैं खा कर तालियां
Wednesday, May 25, 2011
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1 comment:
हुज़ूर, तालियों को गालियाँ समझने की ग़लती हरगिज़ न कीजियेगा. यहाँ नीयत में कोई खोट नहीं.
उम्दा बन पड़ी है , ग़ज़ल .
दे ताली !
एक मुद्दत के बाद नमूदार होने पर खुशामदीद!
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