Thursday, July 28, 2011

हमेशा देर कर देता हूं मैं

हमेशा देर कर देता हूं मैं

ज़रूरी बात कहनी हो

कोई वादा निभाना हो

उसे आवाज़ देनी हो

उसे बापिस बुलाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

मदद करनी हो उसकी

या कि ढाढस बंधाना हो

बहुत देरीना रस्तों पर

किसी से मिलने जाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

बदलते मौसम की सैर में

दिल को लगाना हो

किसी को याद रखना हो

किसी को भूल जाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

किसी को मौत से पहले

किसी ग़म से बचाना हो

हक़ीक़त और थी कुछ

उसे जा के ये बताना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

---मुनीर नियाज़ी

Friday, July 15, 2011

इब्ने इंशा की एक नज़्म

उम्र के इस पड़ाव पर इब्ने इंशा की यह नज़्म बहुत भाती है -

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुंचा हुमकता हुआ
जी मचलाता था इक इक शै पर मगर
जेब खाली थी कुछ मोल ले ना सका
लौट आया लिए हसरतें सैंकड़ों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए
आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूं ते इक इक दुकां मोल लूं
आज चाहूं तो सारा जहां मोल लूं
नारसाई का अब जी में धड़का कहां
पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहां

------------इब्ने इंशा