Thursday, July 28, 2011

हमेशा देर कर देता हूं मैं

हमेशा देर कर देता हूं मैं

ज़रूरी बात कहनी हो

कोई वादा निभाना हो

उसे आवाज़ देनी हो

उसे बापिस बुलाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

मदद करनी हो उसकी

या कि ढाढस बंधाना हो

बहुत देरीना रस्तों पर

किसी से मिलने जाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

बदलते मौसम की सैर में

दिल को लगाना हो

किसी को याद रखना हो

किसी को भूल जाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

किसी को मौत से पहले

किसी ग़म से बचाना हो

हक़ीक़त और थी कुछ

उसे जा के ये बताना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

---मुनीर नियाज़ी

1 comment:

aarkay said...

भारती जी , यह नज़्म दिल को छू गयी क्योंकि देर करने वालों में मैं भी हूँ और शायद इसीलिए एक बिग लूज़र भी.
"बेचैन बहुत फिरना घबराये हुए रहना ... " मुनीर नियाजी साहब की यह ग़ज़ल भी मुझे बहुत पसंद है.

नवाज़िश, करम , शुक्रिया, मेहरबानी !