उम्र के इस पड़ाव पर इब्ने इंशा की यह नज़्म बहुत भाती है -
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुंचा हुमकता हुआ
जी मचलाता था इक इक शै पर मगर
जेब खाली थी कुछ मोल ले ना सका
लौट आया लिए हसरतें सैंकड़ों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए
आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूं ते इक इक दुकां मोल लूं
आज चाहूं तो सारा जहां मोल लूं
नारसाई का अब जी में धड़का कहां
पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहां
------------इब्ने इंशा
Friday, July 15, 2011
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3 comments:
बहुत खूब भारती जी ! मेरी माँ उदहारण के तौर पर कहा करती थी - कान हैं तो सोना नहीं, सोना है तो कान नहीं . यह भाग्य की वि९दम्बननहिन तो क्या है. मुझे आज भी अपने एक वरिष्ठ सहकर्मी की बात याद आती है- जब दांत थे तो खाने को नहीं था, अब खाने को है तो दांत नहीं. इब्ने इंशा मेरी भी पसंद हैं, एक ग़ज़ल- इंशा जी अब तुम कूच करो ........ - तो काफी मन को छूती है.
बहुत खूब भारती जी ! मेरी माँ उदहारण के तौर पर कहा करती थी - कान हैं तो सोना नहीं, सोना है तो कान नहीं . यह भाग्य की विडम्बना नहीं तो क्या है. मुझे आज भी अपने एक वरिष्ठ सहकर्मी की बात याद आती है- जब दांत थे तो खाने को नहीं था, अब खाने को है तो दांत नहीं. इब्ने इंशा मेरी भी पसंद हैं, एक ग़ज़ल- इंशा जी अब तुम कूच करो ........ - तो काफी मन को छूती है.
इन्तज़ार करें और ग़ज़लें नज़्में भी आंएंगी... पिता जी की लिखी कुछ रचनाएं भी डालूंगा।
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