पीत के रोगी सब कुछ बूझे, सब कुछ जाने होते हैं
इन लोगों के ईंट न मारो, कहां दिवाने होते हैं
आहें इनकी उमड़ते बादल, आंसू इनके अब्र-ए-मतीर
दश्त में इनको बाग़ लगाने, शहर बसाने होते हैं
हम न कहेंगे आप हैं पीत के दुश्मन मन के कठोर मगर
आ मिलने के, ना मिलने के लाख बहाने होते हैं
अपने से पहले दश्त में रहते, कोह से नहरें लाते थे
हम ने भी इश्क किया है लोगो सब अफ़साने होते हैं
इंशाजी, छब्बीस बरस के होके ये बातें करते हो
इंशाजी, इस उम्र के लोग तो बड़े सयाने होते हैं
----इब्ने इंशा
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2 comments:
आप ही की तरह मैं भी इब्ने इंशा का मुरीद हूँ. आपने बहुत अच्छी रचना प्रस्तुत
की है , परन्तु पीत शब्द का प्रयोग किस सन्दर्भ में किया गया है, जानना कुछ कठिन लग रहा है . ऐसा तो नहीं कि मुद्रण की अशुद्धि हो और वास्तव में शब्द प्रीत हो !
जानने की उत्सुकता रहेगी .
आभार !
पीत प्रीत के लिए प्रयोग किया गया है। यह इंशा का अपना विशेष तरीका है ।
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