फ़क़त हम ही को न सज़ाएं मिलीं
ग़म की और भी कथाएं मिलीं
गले लग जी भर के रोया
तेरे वतन की जो हवाएं मिलीं
जो भी चाहा वो कहां मिला
मौत मांगी थी दुआएं मिलीं
तुझे भूलना कहां आसान था
हर गाम तेरी सदाएं मिलीं
‘अश्क’ ने बरसना ही हुआ
क्या ताज्जुब कि घटाएं मिलीं
Wednesday, March 31, 2010
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4 comments:
"तुझे भूलना कहां आसान था
हर गाम तेरी सदाएं मिलीं "
शबे फुरकत में तेरी याद हमको बार बार आई
भुलाना हमने भी चाह मगर बेइख्तियार आई
वाह वाह ... इस शेयर ने भी मज़ा लगा दिया
Kya bat hai,kya bat hai
Tumhein bhool to jaien "Bismil" magar kis tarah,
ke tum dil mein nahi saanson be base ho.
Acharya g aapki shayari pahli baar pad-sun raha hoon......maza aa gaya
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