Tuesday, March 2, 2010

नपुंसक पीढ़ी

काफी हाऊसों में
काफी में घुलते मिलते नाराज़गी के शब्द
थोड़ी गर्म बहसें
ऊपर उठा कर हाथ ज़ोरदार आवाज़ में विरोध प्रकटन
और फिर आंखों में उतर आए गुस्से को
दो चार भद्दी गालियों के साथ थूक देना पूरी व्यवस्था के माथे पर
फिर
काफी पी कर सड़क तक आते आते
वो गालियां
वो विरोध
वो बहसें
वो नाराज़गी
जाने कहां खो जातीं हैं
और यहीं समाप्त हो जाता है
मेरी पीढ़ी की युवाशक्ति का विद्रोह

2 comments:

Unknown said...

Nice poem... Keep up the Good Work.

aarkay said...

सुंदर रचना ! आपके कवि रूप से साक्षात्कार कर अच्छा लगा . कमबख्त कॉफ़ी चीज़ ही ऐसी है . थोड़ी देर का खुमार रहता है .