तारे तोड़ लाने के सपने/
मेरी आंखों तक भी पहुंचे
पर पैरों के नीचे ज़मीन ही नहीं थी
ख़ुद को ज़मीन खोजने में लगा दिया
ताकि ज़मीन पर पाँव रखूं
उछलूं
और भर लूं तारों से झोली
पर काफ़ी खोजने के बाद भी
ज़मीन नहीं मिली
अब मेरी आंखों में ज़मीन ही का सपना है –
तारों को मैं भूल चुका हूं
Monday, March 22, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
3 comments:
यथार्थ की ज़मीन सदा पथरीली होती है ,
फिर ख्वाब देखना क्यों छोड़ें !
1995 में लिखी थी। असके बाद तो ख्वाब ही में जी रहे हैं।
Dear Sir
were the dreams imported, not genuinily yours? If real dreams then please go and achieve Is rakh mein abhi tak chingari(lava) baki hai.
Post a Comment