हमेशा देर कर देता हूं मैं
ज़रूरी बात कहनी हो
कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो
उसे बापिस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
मदद करनी हो उसकी
या कि ढाढस बंधाना हो
बहुत देरीना रस्तों पर
किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
बदलते मौसम की सैर में
दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो
किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
किसी को मौत से पहले
किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ
उसे जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
---मुनीर नियाज़ी
1 comment:
भारती जी , यह नज़्म दिल को छू गयी क्योंकि देर करने वालों में मैं भी हूँ और शायद इसीलिए एक बिग लूज़र भी.
"बेचैन बहुत फिरना घबराये हुए रहना ... " मुनीर नियाजी साहब की यह ग़ज़ल भी मुझे बहुत पसंद है.
नवाज़िश, करम , शुक्रिया, मेहरबानी !
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