Friday, November 4, 2011

पीत के रोगी सब कुछ बूझे, सब कुछ जाने होते हैं

पीत के रोगी सब कुछ बूझे, सब कुछ जाने होते हैं
इन लोगों के ईंट न मारो, कहां दिवाने होते हैं

आहें इनकी उमड़ते बादल, आंसू इनके अब्र-ए-मतीर
दश्त में इनको बाग़ लगाने, शहर बसाने होते हैं

हम न कहेंगे आप हैं पीत के दुश्मन मन के कठोर मगर
आ मिलने के, ना मिलने के लाख बहाने होते हैं

अपने से पहले दश्त में रहते, कोह से नहरें लाते थे
हम ने भी इश्क किया है लोगो सब अफ़साने होते हैं

इंशाजी, छब्बीस बरस के होके ये बातें करते हो
इंशाजी, इस उम्र के लोग तो बड़े सयाने होते हैं

----इब्ने इंशा

Thursday, July 28, 2011

हमेशा देर कर देता हूं मैं

हमेशा देर कर देता हूं मैं

ज़रूरी बात कहनी हो

कोई वादा निभाना हो

उसे आवाज़ देनी हो

उसे बापिस बुलाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

मदद करनी हो उसकी

या कि ढाढस बंधाना हो

बहुत देरीना रस्तों पर

किसी से मिलने जाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

बदलते मौसम की सैर में

दिल को लगाना हो

किसी को याद रखना हो

किसी को भूल जाना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

किसी को मौत से पहले

किसी ग़म से बचाना हो

हक़ीक़त और थी कुछ

उसे जा के ये बताना हो

हमेशा देर कर देता हूं मैं

---मुनीर नियाज़ी

Friday, July 15, 2011

इब्ने इंशा की एक नज़्म

उम्र के इस पड़ाव पर इब्ने इंशा की यह नज़्म बहुत भाती है -

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुंचा हुमकता हुआ
जी मचलाता था इक इक शै पर मगर
जेब खाली थी कुछ मोल ले ना सका
लौट आया लिए हसरतें सैंकड़ों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए
आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूं ते इक इक दुकां मोल लूं
आज चाहूं तो सारा जहां मोल लूं
नारसाई का अब जी में धड़का कहां
पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहां

------------इब्ने इंशा

Wednesday, June 22, 2011

ईश्वर समर्पित होने के लिए प्रत्येक घण्टे के बाद स्मरण करने योग्य वाक्य

हे परमेश्वर ! आप सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् तथा न्यायकारी हैं। आपने ही मुझे यह जीवन प्रदान किया है। आप के कारण ही मैं विचारने, बोलने तथा कर्मों को करने में समर्थ हूँ। प्रतयेक क्षण मन, वाणी और शरीर से किए जाने वाले समस्त कर्मों को आप जानते हैं। आप से छुप करके मैं कोई भी काम नहीं कर सकताष आप की अनुभूति मेरी बुद्धि में प्रतयेक क्षण बनी रहे जिससे मैं बुरे कर्मों से और उनके दुःखरूप फल से बचकर सुख-शान्ति को प्राप्त करूँ, ऐसी आप से प्रार्थना है।
-दर्शन योग महाविद्यालय
आर्य वन, रोजड़, पो. सागपुर, जि. साबरकांठा (गुजरात) - 383 307
ई मेल - darshanyog@gmail.com
Website: http://www.darshanyog.org/
दूरभाष - +91 (02770) 287418, +91 (02774) 277217

Wednesday, May 25, 2011

ग़ज़ल

आसमां पर बिठाते हैं सुना कर तालियां
लोग चाल चलते हैं बजा कर तालियां

हम ख़ुद ही से न कर पाए तारीफ़ अपनी
वो मशहूर हो गए छपवा कर तालियां

जिन हाथों को पकड़ दिखाया था रास्ता
मज़ाक़ उड़ाते हैं वो ही बजा कर तालियां

क्यों तक़लीफ़ देते हैं लोग हाथों को
हुज़ूर तो भूल जाते हैं खा कर तालियां